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श्रीप्रेमसम्पुटः ( Sri Prema Samputa - Hindi)

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श्रीप्रेमसम्पुटः  ( Sri Prema Samputa - Hindi)

The Treasure Chest of Pure, Transcendental Love

श्रीश्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर विरचित श्रीप्रेमसम्पुटः  

श्रीश्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज

  • Author: Srila Vishvanatha Chakravarti Thakura
  • Hindi Translated and Commentary by Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja
  • Publisher: 2008, Gaudiya Vedanta Publications
  • Binding: SoftBound
  • Pages: 70
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श्रीप्रेमसम्पुटः  ( Sri Prema Samputa - Hindi)

The Treasure Chest of Pure, Transcendental Love

श्रीश्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर विरचित श्रीप्रेमसम्पुटः  

श्रीगौड़ीय वेदान्त समिति एवं तदन्तर्गत भारतव्यापी श्रीगौड़ीय मठोंके प्रतिष्ठाता, 
श्रीकृष्णचैतन्याम्नाय दशमाधस्तनवर श्रीगौड़ीयाचार्य केशरी
नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके
अनुगृहीत


श्रीश्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज

द्वारा अनुवादित एवं सम्पादित

The word 'sampuṭa refers to that place where precious jewels and other valuable stones are carefully hidden from the vision of people. The illustrious Gauḍiya Vaisnava acarya, Srila Visvanatha Cakravartī Ṭhakura, has revealed the unnata-ujjvala prema (pure transcendental love) in Śrī Radha's heart, which is likened to a treasure chest, and protected it in the box in the form of this book. Therefore, the name of this book is Sri Prema-sampuṭa.

Early one morning, Vrajendra-nandana Śrī Śyāmasundara, the unrestricted carefree enjoyer of rasa, disguised Himself as a young woman of heart-stealing beauty and went to the courtyard of Śrīmatī Rādhikā. Covering His lotus-like face with a crimson veil, He appeared before Her, His eyes bashfully lowered. Within His heart, He yearned to hear of the excellence of Her love for Him and the inferiority of His love for Her.

सम्पुटका अर्थ है वह आधार ( स्थान ) जहाँ बहुमूल्य रत्नादिको लोगोंकी दृष्टिसे बचाकर यत्नपूर्वक गोपन या संरक्षित किया जाता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने श्रीराधाजीके हृदयरूपी सम्पुटसे
उद्घाटित उन्नात-उज्ज्वलरसजात प्रेमका इस ग्रन्थरूपी ‘संदूक’ में संरक्षण किया है, इसलिए इस ग्रन्थका नाम ‘प्रेमसम्पुटः’ है।

रसास्वादनके लम्पट व्रजेन्द्रनन्दन श्रीश्यामसुन्दर इसी स्वभावके वशीभूत होकर एक दिन प्रातःकाल एक मनोहारिणी, अपूर्व सुन्दर रमणीका वेष धारण करके
वृषभानुदुलारी श्रीमती राधिकाके घरके प्राङ्गणमें उपस्थित हुए। उन्होंने अपने मुखकमलको अपने अरुण वस्त्रसे ढक रखा था तथा लज्जायुक्त भावसे अपने नयन-युगलको झुकाकर सहसा वहीं खड़े
रहे।

TITLE: Sri Prema Samputa

AUTHOR: Srila Vishvanatha Chakravarti Thakura

Editor: Srimad Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja

PUBLISHER: Gaudiya Vedanta Publications.

EDITION: Second, 2008.

BINDING: SoftCover

Pages and Size : 70,  8" X 5.5"

SHIPPING WEIGHT: 300 grams.

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