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श्रीमद्भागवतीय वेणु-गीत (SrimadBhagavatiya Venu-Gita - Hindi)

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श्रीमद्भागवतीय वेणु-गीत (SrimadBhagavatiya Venu-Gita - Hindi)

श्रीमद्भागवत-दशम स्कन्ध-इक्कीसवाँ अध्याय 

The Song of Krsna’s Flute, Srimad -Bhagavatam Tenth Canto – Chapter Twenty-one

श्रीमद्कृष्णद्वैपायन-वेदव्यास प्रणीत

श्रीश्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज

  • Author: Sri KrsnaDvaipayan Veda Vyasa
  • Hindi Translated and Commentary by Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja
  • Publisher: 2005, Gaudiya Vedanta Publications
  • Binding: Softcover
  • Pages: 150
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श्रीश्रीगुरु-गौराङ्गो जयतः

श्रीमद्भागवतीय वेणु-गीत (SrimadBhagavatiya Venu-Gita - Hindi)

 [ श्रीमद्भागवत-दशम स्कन्ध-इक्कीसवाँ अध्याय ]
सम्पादक एवं व्याख्याता
श्रीगौड़ीय वेदान्त समिति एवं तदन्तर्गत भारतव्यापी
श्रीगौड़ीय मठोंके प्रतिष्ठाता, श्रीकृष्णचैतन्याम्नाय दशमाधस्तनवर

श्रीगौड़ीयाचार्यकेशरी
ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामीचरणके

अनुगृहीत

त्रिदण्डिस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज

श्रीमद्भागवत साक्षात् भगवान्का स्वरूप है। यह रसके मूर्तिमान विग्रह स्वयं-भगवान् ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णके मधुरतम प्रेमरसका छलकता हुआ सागर है। इसीलिए तो रसिक, भावुक-भक्त इसमें सदैव अवगाहन करते हैं। इसको सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय वेदरूपी कल्पवृक्षका परिपक्व रसमय फल कहा गया है। इसमें भी गोपी-प्रेमको श्रीमद्भागवतका प्रतिपाद्य अथवा चरम प्रयोजन निर्धारित किया गया है। श्रीमद्भागवतीय वेणुगीतमें उक्त गोपी-प्रेमकी कतिपय उत्तुंग लहरें दृष्टिगोचर होती हैं। रसिक भक्तजन इन लहरियोंमें डूबते रहते हैं; उन्हें अपने तनकी भी सुध-बुध नहीं रहती। उक्त सागरकी बेलाभूमिपर खड़े श्रद्धालु भक्तके हृदयमें भी अवगाहन करनेका लोभ अङ्कुरित हो जाता है। श्रीराधा-भाव एवं कान्तिसे देदीप्यमान, रसराज-महाभावके मिलित स्वरूप श्रीचैतन्य महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदर एवं श्रीरायरामानन्दके साथ श्रीगंभीरामें इस वेणुगीतका जिस प्रकारसे रसास्वादन किया, उसके कुछ रसबिन्दुओंका श्रील सनातन गोस्वामी और श्रील जीव गोस्वामीने श्रीमद्भागवतकी वैष्णवतोषणी' टीकामें संग्रह किया है। उसीको उनके उच्छिष्ट या महाप्रसादके रूपमें श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने अपनी सारार्थदर्शिनी' टीका द्वारा सारे विश्वको वितरित करनेका प्रयास किया है।

This book presents a series of lectures spoken in English giving commentry on every sloka of the 21st chapter of the 10th canto of Srimad Bhagvatam. his highest worshipers the gopis, explain their feelings of seperation for Krishna and manifest symptoms of maha-bhava. 

Śrīmad-Bhāgavatam is the fully ripened, nectarean fruit of the desire tree of all Vedic literature, and within this Śrīmad-Bhāgavatam, gopī-prema has been ascertained to be the ultimate objective of the living being. In the chapter called Veṇu-gīta, some of the towering waves of this gopī-prema can be seen. A yearning to be immersed in this nectarean ocean sprouts in the hearts of the faithful devotees who are situated on its shore. In his beautiful elucidation on the verses of Veṇu-gīta, Śrī Śrīmad Bhaktivedānta Nārāyaṇa Gosvāmī Mahārāja reveals the depth of the commentaries his spiritual predecessors, Śrīla Jīva Gosvāmī and Śrīla Viśvanātha Cakravartī Ṭhākura.

This book is a unique and invaluable contribution to our authentic Gaudiya Vaisnava literatures. If any sincere person reads it with an open mind, his heart will surely be attracted and infused with the desire to seriously cultivate vraja-bhakti. The introduction is also significant with its presentation of many authentic proofs in establishing what is the qualification to hear these confidential topics and in asserting that it is actually our duty to hear them from bona fide Vaisnavas in our disciplic line. Presenting many charming descriptions of the moods of the gopis who speak the Venu-Gita, this grantha is a beautiful and priceless gift given by our venerable Gurudeva to the sadhaka who is aspiring to do raganuga bhajana. 

TITLE: SrimadBhagavatiya Venu-Gita - Hindi

AUTHOR: Sri KrsnaDvaipayan Veda Vyasa

Editor: Srimad Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja

PUBLISHER: Gaudiya Vedanta Publications.

EDITION: Second, 2005.

BINDING: Paperback

Pages and Size : 150, 8.5" X 5.5"

SHIPPING WEIGHT: 350 grams.

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