श्रीमद्भगवद्गीता  (Srimad Bhagavad-gita - Hindi) View larger

श्रीमद्भगवद्गीता (Srimad Bhagavad Gita - Hindi)

श्रीमत्कृष्णद्वैपायन-वेदव्यास द्वारा विरचित श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद् विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर विरचित सारार्थवर्षिणी टीकासहित

  • Author: Srimad Krishna Dvaipayana-VedaVyasa
  • Original Sanskrit SararathaVarshini Commentary by Srila Visvanatha Cakravarti Thakura 
  • Translated, Edited and Hindi Commentary by Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja
  • Publisher: 2019, Gaudiya Vedanta Prakshan
  • Binding: Hardbound
  • Pages: 908

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|| श्रीश्रीगुरु-गौराङ्गो जयतः ||

श्रीमत्कृष्णद्वैपायन-वेदव्यास द्वारा विरचित

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीगौड़ीयवैष्णवाचार्य-मुकुटमणि
श्रीमद् विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर विरचित

सारार्थवर्षिणी टीकासहित

 श्रीगौड़ीय वेदान्त समिति एवं तदन्तर्गत भारतव्यापी श्रीगौड़ीय मठोंके
प्रतिष्ठाता, श्रीकृष्णचैतन्याम्नाय दशमाधस्तनवर
श्रीगौड़ीयाचार्यकेशरी नित्यलीलाप्रविष्ट
ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री
श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजजीके अनुगृहीत
त्रिदण्डिस्वामी
श्रीश्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी
महाराज
द्वारा सम्पादित एवं
तत्कृत अन्वय, अनुवाद, सारार्थवर्षिणी-भावानुवाद तथा
सारार्थवर्षिणी-प्रकाशिका-वृत्तिसहित 


"... भारतवर्ष तथा सारे विश्वके विविध हिन्दी भाषी क्षेत्रोंमें मूल टीका और हिन्दी अनुवादसहित इस ग्रन्थरत्नके राजसंस्करणका अभाव विशेषरूपसे अनुभव हो रहा था। ऐसी स्थितिमें मदीय सतीर्थ श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिके उपसभापति और साधारण सम्पादक पूज्यपाद श्रील भक्तिवेदान्त नारायण महाराज द्वारा इस ग्रन्थरत्नके मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय, अनुवाद तथा श्रीगौड़ीय वैष्णव आचार्य महामहोपाध्याय श्रीश्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकरकृत 'सारार्थवार्षिणी' टीका और सहज, सरल तथा बोधगम्य 'सारार्थवर्षिणी-प्रकाशिका-वृत्ति' सहित यह राजसंस्करण प्रकाशित होनेसे श्रीसमिति उनके निकट चिरऋणी तथा चिरकृतज्ञ रहेगी। वर्तमान ग्रन्थके पठन-पाठनकारी सुधी सज्जनवृन्द इसका अनुशीलनकर परमानन्दित तथा उपकृत होंगे, इस विषयमें कोई सन्देह नहीं है।
जगद्गुरु नित्यलीला-प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद १०८ श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपादकी सम्पादनामें उपर्युक्त दो टीकाएँ और भाषा-भाष्य मर्मानुवाद सहित कई संस्करण पहले प्रकाशित हो चुके हैं। तत्पश्चात् श्रील सरस्वती ठाकुरके अनुकम्पित विविध मठ-मन्दिर-आसन-मिशनसे बँगला भाषामें इस ग्रन्थके विविध संस्करण प्रकाशित हुए हैं। आसाम प्रदेशके तेजपुरसे गीताका असमिया भाषामें एक संस्करण एवं अंग्रेजी भाषामें भी कलकत्ता और तमिलनाडुसे कुछ संस्करण प्रकाशित हुए हैं। परन्तु हिन्दी भाषामें श्रीमद्भगवद्गीताका श्रील चक्रवर्ती ठाकुर या बलदेव विद्याभूषणपादकी टीका-समन्वित कोई संस्करण इतने दिनों तक प्रकाशित नहीं हो पाया है। हमारे इस संस्करणका अनुशीलनकर हिन्दी भाषाभिज्ञ सुधिवृन्द और सज्जनमण्डली निश्चितरूपसे आनन्दित और उपकृत होंगे। ..."

श्रीगुरु-वैष्णव-दासानुदास
त्रिदण्डीभिक्षु
श्रीभक्तिवेदान्त वामन

"... अठारह अध्यायोंसे पूर्ण गीताके प्रथम छः अध्यायोंमें कर्मयोग, अन्तिम छः अध्यायोंमें ज्ञानयोग और मध्यके छः अध्यायोंमें भक्तियोगका स्वरूपवैशिष्ट्य प्रतिपादित किया गया है। इसका कारण यह है कि भक्ति मध्यमें अवस्थित रहकर कर्म और ज्ञान दोनोंको अपना आश्रय देती है, क्योंकि बिना भक्तिदेवीकी सहायताके कर्म और ज्ञान अपना कोई फल प्रदान नहीं कर सकते। भक्तिकी सहायतासे ही दोनों फल प्रदान करने में समर्थ होते हैं। 

कर्म - भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं ही अर्जुनको कर्मके सम्बन्धमें उपदेश दिया है कि भगवान् की प्रीति हेतु कर्म करना उचित है। अन्यथा वह कर्म ही मनुष्यके लिए बन्धनका कारण बन जाता है; यथा - 'यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः' (गीता ३/९) यहाँ 'यज्ञार्थात्' का आशय है विष्णुके लिए अर्पित। अतः विष्णुकी प्रीतिके लिए ही कर्म किए जायँ, क्योंकि श्रीकृष्णने कहा है - 'भोक्तारं यज्ञतपसां' गीता (५/२९)। और भी कहते हैं - 'मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य' गीता (३/३०) अर्थात् समस्त कर्मोंको मुझमें समर्पितकर ही करना चाहिए। पुनः 'यत्करोषि' श्लोकके द्वारा कहते हैं - जो कुछ भी करते हो, मेरी प्रसन्नताके लिए ही करो, मुझे ही अर्पित करो। इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रीकृष्णने कर्माधिकारी जीवोंके लिए निष्काम भगवदर्पित कर्म करनेका ही उपदेश दिया है, मात्र कर्म करनेके लिए नहीं। साधारणतः भक्तिसहित कर्म ही 'कर्म' शब्दसे अभिहित है। जिस कर्ममें भक्तिका प्राधान्य रहता है, कर्म भक्ति अधीन होता है, उसे कर्ममिश्रा भक्ति या प्रधानीभूता भक्ति कहते हैं। जिन कर्मोंका उद्देश्य भगवान्की प्रीति होता है - वे ही यथार्थतः कर्म हैं - 'तत्कर्म हरि तोषणं यत्' (श्रीमद्भा. ४/२९/४९) इसलिए गीता (११/५५) में भी ऐसा कहा गया है - 'मत्कर्म कृन्...... यः स मामेति पाण्डव' अर्थात् जो मेरी प्रीतिके उद्देश्यके लिए कर्म करते हैं-वे ही मुझे प्राप्त करते हैं।

ज्ञान - श्रीकृष्णने भगवान्के प्रति शरणागत आर्त्त, जिज्ञासु, अर्थाथी और ज्ञानियोंमें ज्ञानीको ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है। वे ज्ञानी कैसे होते हैं - 'तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते' (गीता ७/१७) अर्थात् वे ज्ञानी ऐकान्तिकी भक्तिवाले और नित्ययुक्त होते हैं; भक्तिरहित निर्विशेष ब्रह्मवादी ज्ञानीसे यहाँ कोई तात्पर्य नहीं है। इसलिए आगे गीता (७/१९) में अपनी बात और स्पष्ट करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं - 'बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते' अर्थात् जो सर्वत्र ही वासुदेवका दर्शन करते हैं, मेरे शरणागत होते हैं और भक्तिमें स्थिरचित्त वाले होते हैं-ऐसे परम ज्ञानी-भक्त सुदुर्लभ हैं। भक्तिप्राधान्यहीन ज्ञान ही 'ज्ञान' शब्द वाच्य है। जो ज्ञान प्रेमाभक्तिके प्रति अभिमुख होता है, उसे ज्ञानमिश्रा भक्ति कहते हैं। और कुछ दूर अग्रसर होनेपर, प्रेमकी प्रचुरता होनेपर जब ज्ञान निरस्त हो जाता है, तब विशुद्ध केवलाभक्ति या प्रेमाभक्ति प्रकाशित होती है।

योग - भगवान्ने छठे अध्यायके अन्तमें योगीकी विशेषरूपसे प्रशंसा की है, उन्हें कर्मी, तपस्वी और ज्ञानीसे भी श्रेष्ठ बतलाया है। अर्जुनको योगी बननेके लिए उपदेश दिया - 'तपस्विभ्योऽधिको योगी' गीता (६/४६), किन्तु अगले श्लोकमें ही भगवान् कहते हैं, कैसा योगी - 'योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना' (गीता ६/४७) अर्थात् समस्त प्रकारके यागियोंमें वे योगी ही सर्वश्रेष्ठ हैं, जो अन्तरात्मासे-हृदयसे श्रद्धापूर्वक सदा-सर्वदा मेरा भजन करते हैं। यहाँ 'मेरा' का तात्पर्य स्वयं श्रीकृष्णसे है। इसलिए जो योगी सब प्रकारसे श्रीकृष्णका ही भजन करते हैं, वे ही गीतामें कथित 'योगी' शब्दवाच्य हैं। यहाँ योगका तात्पर्य पातञ्जल-योगादिसे नहीं है, न ही भक्तिरहित कर्मी, योगी, तपस्वी अथवा निरीश्वर योगियोंसे है।

भक्ति - विश्वरूपका दर्शन करानेके पश्चात् श्रीकृष्णने भक्त अर्जुनको लक्ष्यकर कहा - 'भक्त्या त्वनन्यया शक्यो अहमेवंविधोऽर्जुन' (गीता ११/५४)। अर्थात् अनन्या भक्तिके द्वारा ही मेरे इस स्वरूपका दर्शन संभव है, तुम अनन्य प्रेमीभक्त हो इसीलिए तुमने मेरे इस स्वरूपका दर्शन किया। और भी - 'भक्त्या मामभिजानाति' (१८/५५) अर्थात् केवल अनन्या भक्तिके द्वारा ही कोई मेरा दर्शन कर सकता है, मुझे तत्त्वतः जान सकता है और मेरे धाममें प्रवेशकर मेरी प्रेममयी सेवाको प्राप्त कर सकता है। ..."

श्रीहरि-गुरु-वैष्णव-कृपालेश-प्रार्थी
दीन-हीन
श्रीभक्तिवेदान्त नारायण

This profound translation of Srimad Bhagavad-Gita by Srila Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja is sure to inspire sincere students of bhakti in their practices. It is considered complimentary to the authoritative and popular Bhagavad-Gita As It Is by Srila A.C. Bhaktivedanta Svami Maharaja. This present edition contains the bhavanuvada of the Sarartha-varsini-tika (a shower of the essential meanings) of the illustrious Srila Visvanatha Cakravarti Thakura, which was originally penned in Sanskrit.  His commentary has been further illuminated by Srila Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja's Sarartha-varsini Prakasika-vrtti, which guides the reader into profound aspects of the siddhanta. Consequently, the innermost intentions of the Gita are revealed to the modern audience. Some of the brilliant Rasika-ranjana commentaries by Srila Bhaktivinoda Thakura, have been included within this Prakasika-vrtti.

TITLE: Srimad Bhagavad Gita - Hindi
AUTHOR: Shrimat Krishna Dvaipayana-VedaVyasa
Original Sanskrit Sararatha Varshini Commentary by Shrila Vishvanatha Chakravarti Thakura
Translated, Edited and Hindi Commentary by Srimad Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja
PUBLISHER: Gaudiya Vedanta Prakshan
EDITION: 2019, Third Edition
ISBNs: 9788194267300 9788-1-94267-30-0 8194267307 8-194267-30-7
PAGES: 908, Illustrated, with Index
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  • Author: Srimad Krishna Dvaipayana-VedaVyasa
  • Original Sanskrit SararathaVarshini Commentary by Srila Visvanatha Cakravarti Thakura 
  • Translated, Edited and Hindi Commentary by Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja
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