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श्रीमद्भागवतम् दशमः स्कन्धः (तृतीय खण्ड अध्याय १७-२८) (Srimad Bhagavatam 10th Canto Volume 3, Chapters 17-28 - Hindi)

श्रीमद्कृष्णद्वैपायनवेदव्यास प्रणीतम्
श्लोक, अन्वय, श्लोकानुवाद, सारार्थदर्शिनी टीका, सारार्थदर्शिनी टीकाके भावानुवाद एवं भावप्रकाशिकावृत्ति सहित

श्रीश्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज

  • Author: Srimad Krishna Dvaipayana-VedaVyasa
  • Includes Original Sanskrit SararathaVarshini Commentary by Srila Visvanatha Cakravarti Thakura
  • Edited by Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja
  • Publisher: 2013, Gaudiya Vedanta Prakashan
  • Binding: Hardcover
  • Pages: 660, Illustrated, with Index
  • FREE SHIPPING WITHIN INDIA

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श्रीश्रीगुरु-गौराङ्गौ जयतः

श्रीमद्कृष्णद्वैपायनवेदव्यास प्रणीतम्

श्रीमद्भागवतम्

दशमः स्कन्धः

तृतीय खण्ड अध्याय १७-२८ 

[ श्लोक, अन्वय, श्लोकानुवाद, सारार्थदर्शिनी टीका,
सारार्थदर्शिनी टीकाके भावानुवाद एवं भावप्रकाशिकावृत्ति सहित ]

श्रीगौड़ीय वेदान्त समिति एवं तदन्तर्गत भारतव्यापी श्रीगौड़ीय मठोंके
प्रतिष्ठाता, श्रीकृष्णचैतन्याम्नाय दशमाधस्तनवर श्रीगौड़ीयाचार्य केशरी नित्यलीलाप्रविष्ट
ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशत श्री
श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके

अनुगृहीत
त्रिदण्डिस्वामी श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज
द्वारा सम्पादित 

"वर्तमानमें हिन्दी भाषामें ऐसा कोई भी संस्करण उपलब्ध नहीं है जो श्रीमद्भागवत पर गौड़ीय-वैष्णव आचार्योंकी टीकाओंकी सम्पदसे युक्त हो। इस प्रस्तुत संस्करणमें इस अभावको पूर्ण करनेकी चेष्टा की गयी है। ग्रन्थराज श्रीमद्भागवत भगवान् श्रीकृष्णका साक्षात् स्वरूप है। इसके प्रथमसे नवम, एकादश तथा द्वादश-स्कन्ध श्रीकृष्णके अप्राकृत वपुके विभिन्न अङ्ग हैं, किन्तु दशम-स्कन्ध तो श्रीकृष्णका मुखकमलस्वरूप है। श्रीकृष्णके मुखमण्डल-स्वरूप दशम-स्कन्धमें अप्राकृत कामदेवकी समस्त अप्राकृत भङ्गिमाओंका विलास विराजमान है जिसके द्वारा प्राकृत कामसे जर्जरित जीव अप्राकृत कामदेवके विलाससे आकर्षित होकर परमानन्दमें निमग्न होनेका सौभाग्य प्राप्त करते हैं। कलियुग पावन अवतारी श्रीमन् चैतन्य महाप्रभुके द्वारा जीवोंके परम प्रयोजनके रूपमें जिस श्रीकृष्णप्रेमका दान या वितरण हुआ उसका एकमात्र आधार एवं प्रमाण श्रीमद्भागवत विशेषकर दश्म-स्कन्ध ही है।

श्रील प्रभुपादके इस मनोऽभीष्टकी पूर्ति हेतु एवं मदीय ज्येष्ठ सतीर्थ नित्यलीला प्रविष्ट प्रपूज्यचरण श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन महाराजके द्वारा मुझे श्रीमद्भागवतको गौड़ीय वैष्णव आचार्योंकी टीकाओं सहित हिन्दी भाषामें प्रकाशित करनेके लिए पुनः-पुनः उत्साह प्रदान करनेवशतः मैं इस महान साम्प्रदायिक सेवाके लिए चेष्टाशील हुआ हूँ। इस उद्देश्यसे मैंने श्रीमान् भक्तिवेदान्त तीर्थ महाराजको श्रीमद्भागवत दशम-स्कन्धके मूल-श्लोक, अन्वय, श्लोकानुवाद, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरकी टीका एवं उसके भावानुवादको; तथा श्रील जीव गोस्वामीपाद, श्रील सनातन गोस्वामीपाद एवं अन्यान्य वैष्णव आचार्योंकी टीकाओंके आधारपर एक 'भावप्रकाशिका वृत्ति' प्रस्तुत करनेका निर्देश प्रस्तावना दिया। श्रीमान् भक्तिवेदान्त तीर्थ महाराजने अत्यन्त लगन एवं अक्लान्त परिश्रमसे उक्त विशेषताओंसे समन्वित पाण्डुलिपिको प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् मैंने बहुत सावधानीपूर्वक इस पाण्डुलिपिका निरीक्षण
किया तथा यथा-स्थान संशोधनके साथ-साथ विषयवस्तुको स्पष्ट करने का प्रयास किया।"

श्रीहरि-गुरु-वैष्णवकृपालेश-प्रार्थी
त्रिदण्डिभिक्षु
श्रीभक्तिवेदान्त नारायण

विषय -सूची: प्रस्तावना

सत्तरहवें अध्यायकी कथाका सार
सप्तदशोऽध्यायः-रमणकद्वीपको छोड़कर कालियके यमुना-ह्रदमें आनेकी कथा तथा भगवानके द्वारा व्रजवासियोंकी दावानलसे रक्षा
अठाहरवें अध्यायकी कथाका सार
अष्टादशोऽध्यायः-प्रलम्बासुरका उद्धार
उन्नीसवें अध्यायकी कथाका सार
एकोनविंशोऽध्यायः-गायों और ग्वालबालोंकी दावानलसे रक्षा
बीसवें अध्यायकी कथाका सार
विंशोऽध्यायः-वर्षा और शरद् ऋतुका वर्णन तथा उपमाके बहाने अनेकों उपदेश
इक्कीसवें अध्यायकी कथाका सार
एकविंशोऽध्यायः-शरद् ऋतुमें श्रीकृष्णका रम्य वृन्दावनमें प्रवेश और वेणुगीत
बाइसवें अध्यायकी कथाका सार
द्वाविंशोऽध्यायः-गोप-कन्याओंका कात्यायनी-व्रत, श्रीकृष्ण-द्वारा उनका चीर-हरण तथा वरदान
तेइसवें अध्यायकी कथाका सार
योविंशोऽध्यायः-यज्ञपत्नियोंपर कृपा
चौबीसवें अध्यायकी कथाका सार
चतुर्विंशोऽध्यायः-इन्द्र-यज्ञका निवारण और गोवर्द्धन-यज्ञका प्रवर्तन
पचीसवें अध्यायकी कथाका सार
पञ्चविंशोऽध्यायः-क्रोधित इन्द्रके द्वारा मूसलाधार वर्षा और वज्रपात, श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन-धारण
छब्बीसवें अध्यायकी कथाका सार
षड्विंशोऽध्यायः-नन्दबाबाका श्रीकृष्णके अद्भुत प्रभावको देखकर उसका गोपोंके समक्ष वर्णन
सत्ताइसवें अध्यायकी कथाका सार
सप्तविंशोऽध्यायः-सुरभि और इन्द्रदेवके दाम श्रीकृष्णका अभिषेक
अट्ठाइसवें अध्यायकी कथाका सार
अष्टाविंशोऽध्यायः-वरुणलोकसे नन्दजीको छुड़ाकर लाना और गोपोंको वैकुण्ठ दर्शन कराना

श्लोक-सूची

At the present time there is no Hindi edition of the Tenth Canto Srimad-Bhagavatam which is endowed with the wealth of the Gaudiya Vaisnava acaryas' commentaries. This edition is trying to make up for the lack of this. It contains the Tenth Canto's (17-28 chapters') main slokasanvaya, translation of the slokas, Srila Visvanatha Cakravarti Thakura's commentary in Sanskrit and its bhavanuvada in Hindi, and the Bhavaprakasika vrtti, a commentary based on the tikas of Vaisnava acaryas such as Srila Jiva Gosvami and Srila Sanatana Gosvami.

TITLE: Shrimad Bhagavatam, 10th Canto Volume 3, Chapters 17-28 - Hindi (Slokas, Anvaya, Translation, Srila Vishvanatha Chakravarti Thakura's SararathaVarshini commentary and its Hindi Bhavanuvada and Bhavaprakasika Vrtti)
AUTHOR: Shrimad Krishna Dvaipayana-VedaVyasa
Includes Original Sanskrit SararathaVarshini Commentary by Srila Vishvanath Chakravarti Thakur
Edited by Srimad Bhaktivedanta Narayana Goswami Maharaja
PUBLISHER: Gaudiya Vedanta Prakashan
EDITION: 2013, First Edition
BINDING: Hardcover
PAGES and SIZE: 660, 8.75" X 5.75", Illustrated, with Index
SHIPPING WEIGHT: 950 grams
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श्रीमद्भागवतम् दशमः स्कन्धः (तृतीय खण्ड अध्याय १७-२८) (Srimad Bhagavatam 10th Canto Volume 3, Chapters 17-28 - Hindi)

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श्रीमद्कृष्णद्वैपायनवेदव्यास प्रणीतम्
श्लोक, अन्वय, श्लोकानुवाद, सारार्थदर्शिनी टीका, सारार्थदर्शिनी टीकाके भावानुवाद एवं भावप्रकाशिकावृत्ति सहित

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  • Author: Srimad Krishna Dvaipayana-VedaVyasa
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