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श्रीगीतगोविन्दम् ( Sri Gita-Govinda - Hindi)

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श्रीगीतगोविन्दम्  ( Sri Gita-Govinda  - Hindi) 

Sri Caitanya Mahaprabhu relishing the moods of Sri Gita Govinda its glories became manifest for the whole world.

  • Author: Sri Jayadeva Gosvami
  • Hindi Translation and Commentry by Srimad Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja
  • Publisher: First 2003, Gaudiya Vedanta Publications
  • Binding: HardBound
  • Pages: 416, Illustrated
  • FREE SHIPPING WITHIN INDIA

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श्रीजयदेव गोस्वामी विरचित
श्रीगीतगोविन्दम् ( Sri Gita-Govinda  - Hindi)

अन्वय, अनुवाद, पद्यानुवाद, श्रीपुजारी गोस्वामी कृत
बालबोधिनी टीकाका भावानुवाद सहित

श्रीगौड़ीय वेदान्त समिति एवं तदन्तर्गत भारतव्यापी श्रीगौड़ीय मठोंके
प्रतिष्ठाता, श्रीकृष्णचैतन्याम्नाय दशमाधस्तनवर
श्रीगौड़ीयाचार्यकेशरी नित्यलीलाप्रविष्ट
ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री
श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजजीके अनुगृहीत

त्रिदण्डिस्वामी
श्रीश्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज
द्वारा सम्पादित

"Sri Gita-Govinda is a "jewel book" brought by Sri Chaitanya Mahaprabhu. We all know that Sri Jayadeva Gosvami has written this beautiful Gita Govinda, but without Sri Caitanya Mahaprabhu it would have remained locked like a pearl in the oyster shell or a jewel in a locked case. Sri Caitanya Mahaprabhu manifested the glories of Sri Gita Govinda. Just as without Srila Rupa Gosvami no one would have known the inner moods of Sri Caitanya Mahaprabhu, similarly, by Sri Caitanya Mahaprabhu relishing the moods of Sri Gita Govinda its glories became manifest for the whole world. I have explained this very high-class philosophy, but only rare devotees in this world can understand it. I have called you here only to give you this."

श्रीजयदेव कविने इस मधुर-काव्यमें गान्धर्व-विद्याका कौशल, ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीश्यामसुन्दरके चिन्तन-स्मरणका समस्त रहस्य, सम्भोग और विप्रलम्भ दोनों प्रकारके शृंगाररसका विस्तृत विवेचन तथा काव्य-प्रणयकी प्राचीन पद्धति, सभीका मणिकाञ्चन न्यायसे सन्निवेश किया है। उन्होंने स्वयं कहा है - ‘सानन्दाः परिशोधयन्तु सुधियः श्रीगीतगोविन्दतः’ (१२/२४/११) इस चतुर्थ चरणका यह भी अभिप्राय है कि इन समस्त वस्तुओंका पूर्णतः शुद्धरूप इस गीतगोविन्द काव्यमें ही एकमात्र उपलब्ध हो सकता है। अतएव विद्वानोंको चाहिए कि वे इस काव्यको भलीभाँति परीक्षण करके देखें और जानें भी। श्रीजयदेव कविको इस बातका दृढ़ विश्वास है कि श्रीगीतगोविन्द-काव्यके माधुर्यके सामने अंगूरकी मदिरा, चीनीकी मिठास, पके आम्रफल तथा कामिनीके अधररस - ये सब उपेक्षणीय हैं; क्योंकि इस शृंगारकाव्यमें शृंगाररसका सम्पूर्ण सार समाविष्ट है। 

विषय-सूची: सामोद-दामोदरः, अक्लेश केशवः मुग्ध मधुसूदनः, स्निग्ध-मधुसूदनः, सकांक्ष-पुण्डरीकाक्षः, धृष्ट-वैकुण्ठः, नागर-नारायणः, विलक्ष-लक्ष्मीपतिः, मुग्ध-मुकुन्दः, मुग्ध-माधवः, स्वानन्द-गोविन्दः, सुप्रीत-पीताम्बरः | 

TITLE: श्रीगीतगोविन्दम्  ( Sri Gita-Govinda  - Hindi) 

AUTHOR: Sri Jayadeva Gosvami

Hindi Translation and Commentry by Srimad Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja

PUBLISHER: Gaudiya Vedanta Publications.

EDITION: First Edition, 2003.

BINDING: HardBound

Pages and Size : 416, Illustrated, 9" X 6" 

SHIPPING WEIGHT: 800  grams.

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