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मायावाद की जीवनी (Mayavad Ki Jivani - Hindi)

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मायावाद की जीवनी (Mayavad Ki Jivani - Hindi)

मायावाद की जीवनी या वैष्णव विजय

श्रीश्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

  • Author: Sri Srimad Bhakti Prajnana Kesava Gosvami Maharaja
  • Hindi Translated and Edited by Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja
  • Publisher: 2005, Gaudiya Vedanta Publications
  • Binding: SoftBound
  • Pages: 102
  • FREE SHIPPING WITHIN INDIA

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श्रीश्रीगुरु-गौराङ्गो जयतः

मायावाद की जीवनी (Mayavad Ki Jivani - Hindi)

मायावाद की जीवनी या वैष्णव विजय

श्रीगौड़ीय वेदान्त समिति एवं तदन्तर्गत भारतव्यापी
श्रीगौड़ीय मठोंके प्रतिष्ठाता, श्रीकृष्णचैतन्याम्नाय
दशमाधस्तनवर श्रीगौड़ीयाचार्य केशरी
ॐ विष्णुपाद
श्रीश्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी
महाराज द्वारा विरचित
एवं
तदीय अनुगृहीत
त्रिदण्डिस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज
द्वारा अनुवादित एवं सम्पादित

सन् १९१५ ई० में मैंने श्रीचैतन्यमहाप्रभुके जन्मस्थान श्रीधाम मायापुरमें जगद्गुरु श्रीलभक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामीका दर्शन किया तथा उनके श्रीमखविगलित हरिकथा श्रवणका सयोग पाया। हरिकथा-श्रवणकी प्रथम भूमिकामें मायावादके विरुद्ध बहुत कुछ सुननेका सुयोग प्राप्त हुआ। पश्चात् सन् १९१९ ई० से जगद्गुरुॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरके श्रीचरणोंके आनुगत्यमें सम्पूर्णरूपसे साधन-भजन करनेकी इच्छासे उनके द्वारा दीक्षित होकर स्थायी रूपसे श्रीचैतन्य मठ-व्रजपत्तनमें निवास करने लगा। धीरे-धीरे श्रीगुरुदेवके समीप धर्मतत्त्व और शास्त्र-सिद्धान्तके विषयमें शिक्षा ग्रहण करने लगा। कथाप्रसंगमें वे बार-बार कहते थे-“जब तक इस पृथ्वीपर मायावाद प्रचलित रहेगा, तब तक शुद्धभक्तिके पथमें विभिन्न प्रकारकी विघ्न-बाधाएँ पैदा होती रहेंगी, इसलिए श्रीशंकराचार्यके द्वारा प्रचारित अद्वैतवाद या मायावादको जड़के सहित उखाड़ फेंकना होगा।” उन्होंने अपने इस विचारको अपने पत्र पत्रिकाओं, प्रबन्धों, निबन्धों, अनुभाष्यों एवं विवृत्ति आदिमें सर्वत्र ही स्पष्टरूपसे प्रकाशित किया है।

श्रीलप्रभुपादकी यह शिक्षा मेरे हृदयमें दृढ़तापूर्वक बद्धमूल हो गई। मैंने श्रीलप्रभुपादक मनोऽभीष्टको पूर्ण करनेका संकल्प ग्रहण कर लिया। इस संकल्पको पूर्ण करनेके लिए मैंने वेदान्त दर्शनके दस-बारह विभिन्न भाष्यकारों
द्वारा रचित भाष्यग्रन्थोंका संग्रह किया। कुछ दिनों तक इनका गम्भीररूपसे अध्ययन किया, तत्पश्चात् मैंने Cuttack Ravanshaw College के एक विद्वत्सभामें शंकर-दर्शनके सम्बन्धमें भाषण दिया। मेरे भाषणका
सारमर्म 'दैनिक नदिया प्रकाश' पत्रिकामें कुछ-कुछ प्रकाशित हुआ। मैंने मूलतः श्रीमन्महाप्रभु द्वारा आचरित और प्रचारित नामभजनशिक्षाका अवलम्बन करते हुए ही ब्रह्मसूत्रका विचार प्रदर्शन किया है। आचार्य शंकरने
ब्रह्मसूत्रके स्वरचित भाष्यमें अपने जिन मौलिक सिद्धान्तोंका प्रतिपादन किया है, वे वेदान्त दर्शनके मूल सिद्धान्तोंके सम्पूर्ण विरुद्ध हैं। ब्रह्म निराकार, निर्विशेष और निर्गुणस्वरूप नहीं है। क्योंकि ब्रह्मसूत्रके लगभग पाँच सौ पचास सूत्रोंमें कहीं भी उक्त तीनों शब्दोंका उल्लेख नहीं है। ब्रह्म निर्विशेष नहीं है, निराकार नहीं है, निःशक्तिक नहीं है तथा निर्गुण भी नहीं है। ब्रह्म यदि निर्गुण होते तो उनमें दया गुण कभी भी नहीं रह सकता। यही नास्तिक या आसुरिक विचारधाराका मूल उपादान है। वेदव्यासने स्वरचित वेदान्तसूत्रमें उक्त तीनों शब्दोंका कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। आचार्य शंकरने उपरोक्त नास्तिकता और आसुरिक विचारपूर्ण तीनों शब्दों को कहीं दूसरी जगहसे उद्धारकर ब्रह्मसूत्रके कन्धे पर रखनेकी व्यर्थ चेष्टा की है। इसलिए अद्वैतवाद या मायावादका ब्रह्म यथार्थमें ब्रह्मसूत्रमें वर्णित शुद्ध ब्रह्म नहीं है। वह शून्यकी भाँति मिथ्या कल्पनामात्र है। इससे पाठकगण इस ग्रन्थका पाठकर भलीभाँति अवगत हो सकेंगे।

This book especially investigates the philosophy of Sri Sankaracarya, whose philosophical misinterpretations of the Vedas were so influential that not only did he succeed in driving Buddhism out of India, but what most of us now think of as Hinduism is fundamentally nothing but his brand of impersonal Mayavadism. To quote the author, "...it can be safely concluded that in truth, any philosophy which has the propensity to dilute, divide, and confuse the rational, logical or factual understanding of the Supreme Lord's personal form, has at some juncture been influenced by the deceptive forces of Mayavadism." Furthermore, this book demonstrates that Sankaracarya's teachings are in the final analysis ironically nothing but a recycled form of Buddhism and in no way true to the original Vedic wisdom known as sanatana-dharma.

TITLE: Mayavad Ki Jivani - Hindi

AUTHOR: Sri Srimad Bhakti Pragyan Keshav Gosvami Maharaj

Editor and Hindi Transator: Srimad Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaj

PUBLISHER: Gaudiya Vedanta Publications.

EDITION: Second, 2005.

BINDING: SoftCover

Pages and Size : 102,  8.5" X 5.25"

SHIPPING WEIGHT: 300 grams.

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